कालिदास प्राचीन भारत में संस्कृत भाषा के उच्च-कोटि के कवि और नाटककार थे। आधुनिक विद्वानों ने तो उन्हें राष्ट्रीय कवि तक का स्थान दिया है।
महाकवि कालिदास के नाम का शाब्दिक अर्थ ‘काली का सेवक’ है और वो काली मां के अनन्य भक्त थे।
वर्तमान समय में लगभग 40 ऐसी रचनाएँ हैं जिन्हें कालिदास के नाम से जोड़ा जाता है। लेकिन इनमें से केवल सात ही निर्विवाद रूप से महाकवि कालिदास द्वारा रचित मानी जाती हैं। इन सात में से तीन नाटक, दो महाकाव्य और दो खण्डकाव्य हैं।
महाकवि कालिदास की सात रचनाओं और उनके जीवन के बारे में नीचे विस्तार से बताया गया है-
ऐसी सात प्रमुख रचनाएँ हैं जिन्हें निर्विवाद रूप से कालिदास रचित माना जाता है। इन सात में से तीन नाटक हैं – अभिज्ञान शाकुन्तलम्, विक्रमोर्वशीयम् और मालविकाग्निमित्रम्; दो महाकाव्य हैं- रघुवंशम् और कुमारसंभवम्; और दो खंण्डकाव्य हैं- मेघदूत और ऋतुसंहार। इन सभी का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है-
अभिज्ञान शाकुन्तलम् – यह नाटक महाभारत के आदिपर्व के शकुन्तलोपाख्यान पर आधारित है जिसमें राजा दुष्यंत और शकुंतला की प्रेम-कथा का वर्णन है। इस नाटक के कुल 7 अंक हैं। अभिज्ञान शाकुन्तलम् ही वो रचना है जो कालिदास की जगतप्रसिद्धि का कारण बना। 1791 में जब इस नाटक का अनुवाद जर्मन भाषा में हुआ, तो उसे पढ़कर जर्मन विद्वान गेटे इतने गदगद हुए कि उन्होंने इस नाटक की प्रशंसा में एक कविता लिख डाली।
विक्रमोर्वशीयम् – यह एक रोमांचक नाटक है। इसमें स्वर्ग में रहने वाले पूरूरवा अप्सरा उर्वशी के प्यार में पड़ जाते हैं। उर्वशी भी उनके प्यार में पड़ जाती है। इंद्र की सभा में जब उर्वशी नृत्य करने के लिए जाती है तो पूरूरवा से प्रेम के कारण वो वहां पर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाती जिसकी वजह से इंद्र देव उसे श्राप देकर धरती पर भेज देते हैं। लेकिन अगर उसका प्रेमी उसके होने वाली संतान को देख ले, तो वो वापिस स्वर्ग लौट सकती है।
मालविकाग्निमित्रम् – मालविकाग्निमित्रम् में राजा अग्निमित्र की कहानी है जिसमें वो घर से निकाले गए एक नौकर की बेटी मालविका के चित्र से प्यार करने लगता है। काफी उतार-चढ़ाव और मुसीबतों के बाद अग्निमित्र और मालविका का मिलन हो जाता है।
रघुवंशम् – रघुवंशम् महाकाव्य में रघुकुल वंश के राजाओं का वर्णन किया गया है। भगवान राम रघुकुल वंश से ही थे। इसमें बताया गया है कि दिलीप रघुकुल के प्रथम राजा थे। दिलीप के पुत्र रघु, रघु के पुत्र अज, अज के पुत्र दशरथ और दशरथ के भगवान राम समेत चार पुत्र थे।
कुमारसंभवम् – कुमारसंभवम् में शिव-पार्वती की प्रेमकथा और उनके पुत्र कार्तिकेय के जन्म की कहानी है। कई विद्वानों का मानना है कि कालिदास की मूल रचना में केवल शिव-पार्वती की प्रेमकथा ही शामिल थी जबकि कार्तिकेय के जन्म की कहानी बाद के किसी और कवि द्वारा जोड़ी गई है।
मेघदूत – मेघदूत में एक साल के लिए नगर से निष्कासित एक सेवक जिसका नाम यक्ष होता है, को अपनी पत्नी की याद सताती है और वो मेघ यानि कि बादल से प्रार्थना करता है कि वो उसका संदेश उसकी पत्नी तक लेकर जाए।
ऋतुसंहार – यह ऐसा खण्डकाव्य है जिसे कई विद्वान कालिदास की रचना मानते ही नहीं। इसमें राजा विक्रमादित्य का वर्णन है। इसके सिवाए यह संस्कृत साहित्य की पहली ऐसी रचना है जिसमें भारतवर्ष की सभी ऋतुओं का वर्णन क्रम अनुसार किया गया है।
महाकवि कालिदास के नाम का शाब्दिक अर्थ ‘काली का सेवक’ है और वो काली मां के अनन्य भक्त थे।
वर्तमान समय में लगभग 40 ऐसी रचनाएँ हैं जिन्हें कालिदास के नाम से जोड़ा जाता है। लेकिन इनमें से केवल सात ही निर्विवाद रूप से महाकवि कालिदास द्वारा रचित मानी जाती हैं। इन सात में से तीन नाटक, दो महाकाव्य और दो खण्डकाव्य हैं।
महाकवि कालिदास की सात रचनाओं और उनके जीवन के बारे में नीचे विस्तार से बताया गया है-
ऐसी सात प्रमुख रचनाएँ हैं जिन्हें निर्विवाद रूप से कालिदास रचित माना जाता है। इन सात में से तीन नाटक हैं – अभिज्ञान शाकुन्तलम्, विक्रमोर्वशीयम् और मालविकाग्निमित्रम्; दो महाकाव्य हैं- रघुवंशम् और कुमारसंभवम्; और दो खंण्डकाव्य हैं- मेघदूत और ऋतुसंहार। इन सभी का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है-
अभिज्ञान शाकुन्तलम् – यह नाटक महाभारत के आदिपर्व के शकुन्तलोपाख्यान पर आधारित है जिसमें राजा दुष्यंत और शकुंतला की प्रेम-कथा का वर्णन है। इस नाटक के कुल 7 अंक हैं। अभिज्ञान शाकुन्तलम् ही वो रचना है जो कालिदास की जगतप्रसिद्धि का कारण बना। 1791 में जब इस नाटक का अनुवाद जर्मन भाषा में हुआ, तो उसे पढ़कर जर्मन विद्वान गेटे इतने गदगद हुए कि उन्होंने इस नाटक की प्रशंसा में एक कविता लिख डाली।
विक्रमोर्वशीयम् – यह एक रोमांचक नाटक है। इसमें स्वर्ग में रहने वाले पूरूरवा अप्सरा उर्वशी के प्यार में पड़ जाते हैं। उर्वशी भी उनके प्यार में पड़ जाती है। इंद्र की सभा में जब उर्वशी नृत्य करने के लिए जाती है तो पूरूरवा से प्रेम के कारण वो वहां पर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाती जिसकी वजह से इंद्र देव उसे श्राप देकर धरती पर भेज देते हैं। लेकिन अगर उसका प्रेमी उसके होने वाली संतान को देख ले, तो वो वापिस स्वर्ग लौट सकती है।
मालविकाग्निमित्रम् – मालविकाग्निमित्रम् में राजा अग्निमित्र की कहानी है जिसमें वो घर से निकाले गए एक नौकर की बेटी मालविका के चित्र से प्यार करने लगता है। काफी उतार-चढ़ाव और मुसीबतों के बाद अग्निमित्र और मालविका का मिलन हो जाता है।
रघुवंशम् – रघुवंशम् महाकाव्य में रघुकुल वंश के राजाओं का वर्णन किया गया है। भगवान राम रघुकुल वंश से ही थे। इसमें बताया गया है कि दिलीप रघुकुल के प्रथम राजा थे। दिलीप के पुत्र रघु, रघु के पुत्र अज, अज के पुत्र दशरथ और दशरथ के भगवान राम समेत चार पुत्र थे।
कुमारसंभवम् – कुमारसंभवम् में शिव-पार्वती की प्रेमकथा और उनके पुत्र कार्तिकेय के जन्म की कहानी है। कई विद्वानों का मानना है कि कालिदास की मूल रचना में केवल शिव-पार्वती की प्रेमकथा ही शामिल थी जबकि कार्तिकेय के जन्म की कहानी बाद के किसी और कवि द्वारा जोड़ी गई है।
मेघदूत – मेघदूत में एक साल के लिए नगर से निष्कासित एक सेवक जिसका नाम यक्ष होता है, को अपनी पत्नी की याद सताती है और वो मेघ यानि कि बादल से प्रार्थना करता है कि वो उसका संदेश उसकी पत्नी तक लेकर जाए।
ऋतुसंहार – यह ऐसा खण्डकाव्य है जिसे कई विद्वान कालिदास की रचना मानते ही नहीं। इसमें राजा विक्रमादित्य का वर्णन है। इसके सिवाए यह संस्कृत साहित्य की पहली ऐसी रचना है जिसमें भारतवर्ष की सभी ऋतुओं का वर्णन क्रम अनुसार किया गया है।
