कुछ मुस्लिम समुदायों में सालों से 'खतना प्रथा' या 'खफ्ज प्रथा' का माना जा रहा है। महिलाओं का खतना एक ऐसी कुप्रथा है, जिससे न सिर्फ महिलाएं अपना मानसिक संतुलन खो देती हैं, बल्कि उनके शरीर को बेहद नुकसान भी पहुँचता है। जो लड़कियाँ बच भी जाती हैं, इस कुप्रथा से जुड़ी दर्दनाक यादें ताउम्र उनके साथ रहती है। बोहरा, शिया मुस्लिम हैं, जिनकी संख्या लगभग 2 मिलियन है और ये महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान में बसे हैं।
चित्र स्रोत - End FGM website launched to warn of dangers of practice
ख़तना कराने की उम्र - जैसे ही कोई बच्ची 7 साल की हो जाती है, उसकी मां या दादी उसे एक दाई या लोकल डॉक्टर के पास ले जाती हैं। बच्ची को ये भी नहीं बताया जाता कि उसे कहां ले जाया जा रहा है या उसके साथ क्या होने वाला है। दाई या आया या वो डॉक्टर उसके क्लिटोरि को काट देते हैं। इस प्रथा का दर्द ताउम्र के लिए उस बच्ची के साथ रह जाता है। इस प्रथा का एकमात्र उद्देश्य है, बच्ची या महिला की काम इच्छाओं को दबाना।
एफजीएम Female genital mutilationअफ्रीका के कई हिस्सों और मध्य एशिया में सदियों से जारी है लेकिन भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका में इसके बारे में ज़्यादा सुनने को नहीं मिलता है। फिलहाल भारत में खतना को लेकर कोई भी कानून नहीं है लेकिन बोहरा समुदाय अब भी खतना या महिला सुन्नत का पालन करता है। यहां सिर्फ दाऊदी बोहरा समुदाय में ये परंपरा पाई जाती है। यमन के शिया मुसलमानों का एक हिस्सा रहे बोहरा 16वीं सदी में भारत आए थे। आज वह मुख्य रूप से गुजरात और महाराष्ट्र में रहते हैं। दाऊदी बोहरा देश में सबसे पढ़े-लिखे समुदायों में से हैं। भारत में इसे मानने वाले दाऊदी बोहरा मजबूत व्यापारी मुस्लिम समुदाय है। करीब 10 लाख लोग मुंबई और आसपास के इलाकों में रहते हैं।
यूएन ने साल 2030 तक एफजीएम को खत्म करने का लक्ष्य रखा है। दुनियाभर में हर साल करीब 20 करोड़ बच्चियों या लड़कियों का खतना होता है। इनमें से आधे से ज्यादा सिर्फ तीन देशों में हैं, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया। बहुत से देशों ने इस पर प्रतिबंध भी लगा दिया है। लेकिन भारत में ऐसा कोई क़ानून नहीं है और बोहरा अब भी इस परंपरा का पालन करते हैं- जिसे यहां खतना या महिला सुन्नत कहते हैं। इस परंपरा की कुरान में इजाज़त नहीं है। अगर होती तो भारत में सभी मुसलमान इसका पालन करते। बोहरा समुदाय में यह इसलिए चल रही है क्योंकि कोई इस पर सवाल नहीं उठाता।
एफजीएम महिलाओं और लड़कियों के मानवाधिकार का हनन है। महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव का ये सबसे बड़ा उदाहरण है। बच्चों के साथ ये अक्सर होता है और ये उनके अधिकारों का भी हनन है। इस प्रथा से व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है।
महिला खतना की प्रक्रिया
• महिला योनि के एक हिस्से क्लिटोरिस को रेजर ब्लेड से काट कर खतना किया जाता है। वहीं कुछ जगहों पर क्लिटोरिस और योनि की अंदरूनी स्किन को भी थोड़ा सा हटा दिया जाता है।
• खतना की इस परंपरा के पीछे यह माना जाता है कि महिला यौनिकता पितृसत्ता के लिए खतरा है, साथ ही महिलाओं को यौन संबंध का लुत्फ उठाने का कोई अधिकार नहीं है।
• ऐसी मान्यता है कि जिस भी लड़की का खतना हुआ है, वह अपने पति के लिए ज्यादा वफादार साबित होगी।
• संयुक्त राष्ट्र की संस्था विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, खतना 4 तरीके का हो सकता है- पूरी क्लिटोरिस को काट देना, योनी की सिलाई, छेदना या बींधना, क्लिटोरिस का कुछ हिस्सा काटना।
खतना के नुकसान
• एक ही ब्लेड से कई महिलाओं का ख़तना किया जाता है, जिससे उन्हें योनी संक्रमण के अलावा बांझपन जैसी बीमारियाँ होने का ख़तरा होता है।
• ख़तने के दौरान ज्यादा खून बहने से कई बार लड़की की मौत भी हो जाती है और दर्द सहन न कर पाने पर कई लड़कियाँ कोमा में भी चली जाती हैं।
ख़तना से जुड़े आंकड़े
• यूनिसेफ के अनुसार, दुनियाभर में हर साल बीस करोड़ से ज्यादा महिलाओं का खतना होता है।
• इनमें से आधी महिलाएं सिर्फ इथियोपिया, मिस्र और इंडोनेशिया की होती हैं।
• इन 20 करोड़ लड़कियों में से करीब 4.5 करोड़ बच्चियां 14 साल से कम उम्र की होती हैं।
स्रोत - बीबीसी